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    Home»All News»विदेशी विचारों और सिद्धांतों का फ़ैशन।
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    विदेशी विचारों और सिद्धांतों का फ़ैशन।

    ना तो ये सिद्धान्त जनता के काम के हैं और ना ही विचार। आलीशान एयरपोर्ट, होटल, कोनफ्रेंस और पुरस्कार समारोहों में भाग लेने से जो विचार पैदा हो रहे हैं वो भी उसी प्रकार 80% जनता से कोई संबंध नहीं रखते।
    adminBy adminJune 27, 2026No Comments9 Mins Read
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    भारत वर्ष में हमेशा से विदेशी चीजों को आदर दिया जाता रहा है, विदेशी वस्तुओं को हमारे देश में एक विशेष दर्जा प्राप्त है। पर आजकल विदेश एक अलग तरह की श्रेष्ठता का बोध अनुभव कर रहे हैं। भारतीय पहले विदेश भ्रमण के दौरान जब विदेश भ्रमण पर जाते थे तो विदेशी कपड़े, जूते, पर्स, पर्फ्यूम, सोना, घड़ियाँ आदि अपने थैलों और अटेचियों में भर कर लाते थे। वैश्वीकरण के बाद हम विदेश प्रवास पर रोजगार, व्यवसाय और पढ़ाई के लिए अधिक जाने लगे हैं। अब थैलों और अटेचियों में विदेशी सामान तो उतना नहीं भर कर आता है (शायद अब इसका फ़ैशन कम हो गया है, इसका एक कारण यह भी है कि अब विदेशी ब्रांड भारत में भी सरलता से उपलब्ध हैं) पर अब एक नया फ़ैशन आ गया है। हम अपने दिमाग में विदेशी विचार और सिद्धान्त भर कर लाना पसंद करते हैं। पुलिस, प्रशासन, न्यायालय, आर बी आई, पेशेवर संस्थान सब इस होड में लगे हैं कि कौन कितना जल्दी आधुनिक बने। इस आग में घी का काम सेमिनार, कोनफ्रेंस और डेलीगेशन करते हैं – जो तथाकथित आधुनिकता को आने में वर्षों लगते वो अब चंद दिनों में आ जाती है। इस सब खर्चे का प्रयोजक आम आदमी है, जो बिचारा इसकी उपयोगिता से अनभिज्ञ है।

    दिल्ली सरकार ओड़ इवन फ़ार्मूला चीन, मेक्सिको और फ़्रांस से प्रेरित हो कर लायी, एक्साइज – वैट को प्रतिस्तापित कर भारत में लागू किया गया जी एस टी कानून “कनाडा” देश से आयातित है, आई एफ आर एस से भारतीय सनदी लेखकार संस्थान ने इंड एस की ईजाद करी है, भारतीय आयुध कारखाने ब्रिटिश मॉडल पर आधारित है (जो भविष्य में निर्यातक होनेवाले हैं), भारतीय लागत लेखांकन (जिसे अब ICMAI कहा जाता है) संस्थान अपना पाठ्यक्रम आई फेक (IFAC) की तर्ज पर परिवर्तित कर रहा है। हमारी जनता को चाहे रोटी मिले न मिले पर सोशल मीडिया से वैश्विक विचारधारा उन तक पहुँच रही है। हर संस्थान, हर भारतीय, हर राज्य सरकार और केंद्र सरकार का हर विभाग अपने आप को विदेशी विचारों और सिद्धान्तों का प्रयोग कर आधुनिक बनाना चाह रहा है। अंतरराष्ट्रीय स्तर के एयरपोर्ट, रेल्वे स्टेशन, माल, शो रूम बन रहे हैं (सब विदेशी तर्ज़ पर)। और यह आधुनिकीकरण सब भारतीय जनता के लिए है – 60% जनता कृषि पर आधारित है जो इन सुविधाओं को उपयोग करने में असमर्थ है, और 30% जनता जो छोटे उद्योगों पर आश्रित है उधार और पूंजी की भयंकर कमी से जूझ रही है।

    इस जनता को पंचायती राज, सत्ता विकेन्द्रीकरण, आत्मनिर्भर ग्रामीण अर्थव्यवस्था की जरूरत है, इस जनता (कृषी और एम एस एम ई) को अपनी सेवाओं और उत्पाद में वैल्यू एडिशन की जरूरत है ताकि देश के सकल घरेलू उत्पाद में उसका हिस्सा बढ़े – ये विचार पुलिस, प्रशासन, न्यायालय, आर बी आई और पेशेवर संस्थानों की प्राथमिकता सूची में नहीं है। उन्हे तो विदेशी विचार और सिद्धान्त अपनाकर जल्दी से जल्दी विकसित होना है, जल्दी से जल्दी विदेशी मानकों पर अपने आपको साबित करना है। पब्लिक सरवेंट सब का ध्यान रख रहा है, विकसित हो रहा है, नए नए विचार नयी नयी सूचनाए उसे रोज आकर्षित कर रहे है। विदेशी चकचोंध में उसे पब्लिक का ही ध्यान नहीं वो यह भूल गया। 8000 रु. महीना कमाने वाला बैंक का अस्थाई कर्मचारी देश में 50% जनता से अमीर है। उस जनता के लिए इतना विकास, उस जनता का इतना ध्यान, पूरी सरकारी मशीनरी 5% जनता की तरफ अपना सारा ध्यान दे रही है, ये नए विदेशी विचार और सिद्धान्त इसी 5% जनता के काम के हैं। भारत में 425000 सी ए हैं जिनकी 100000 रजिस्टर्ड सी ए फ़र्म है और उनमे से मात्र 2.10% फ़र्म के पास लीस्टेड पब्लिक कंपनी क्लाईंट हैं। सी ए संस्थान के पूरा ध्यान विदेशी आई एफ आर एस, विदेशी लेखांकन सिद्धांतों, सेमिनार और कोनफ्रेंस आयोजन पर है। बहुत कम इस प्रकार की कोनफ्रेंस और सेमिनार आयोजित होती हैं जो 98% सी ए के काम की हों। सेमिनार और आयोजनों का पूरा खर्च ये ही 98% सी ए उठाते हैं। अंतरराष्ट्रीय स्तर का पुरस्कार सी ए संस्थान द्वारा लेखांकन, इकोनिमिक्स आदि पर दिया जाता है। पिछले तीन वर्ष से (जब से ये पुरस्कार शुरू हुए हैं) संस्थान ने एक भी पुरस्कार अंकेक्षण में अनुसंधान के लिए नहीं दिया है।मिड साइज़ और स्माल साइज़ फ़र्म अपनी 50% आय अंकेक्षण से प्राप्त करती हैं। फिर किसका अनुसंधान हो रहा है।

    “अंधा बांटे रेवड़ी फिर फिर अपनो को दे”

    1. ना तो ये सिद्धान्त जनता के काम के हैं और ना ही विचार। आलीशान एयरपोर्ट, होटल, कोनफ्रेंस और पुरस्कार समारोहों में भाग लेने से जो विचार पैदा हो रहे हैं वो भी उसी प्रकार 80% जनता से कोई संबंध नहीं रखते। बड़ी 4 ऑडिट फ़र्म हमेशा से छोटे देशी सी ए का हिस्सा खाती आ रही है, पर अब तो सारी मशीनरी उनकी है, सारी सोच उनकी है, सारे सिद्धान्त उनके हैं और सारे पुरुसकार उनके हैं। बड़ा दुख है, रही सही आम आदमी की सोचने समझने की शक्ति भी इस भौतिकवादी समाज ने छीन ली है। लोग कर्ज़ ले ले कर खर्चा कर रहे है, व्यवसाय से पूंजी निकाल- निकाल कर खर्चा कर रहे हैं। रोज़मर्रा उपयोग की वस्तुओं की दुकानों पर कतार है, स्कूल, हॉस्पिटल, रेल, बस, नौकरी सब जगह कतार है। युवा अपनी जान से हाथ धो रहे हैं। अधिकतर बड़े देशी उद्योग विदेशी प्रतिस्पर्धा में नहीं टिक पा रहे हैं (पुरानी तकनीक, अधिक लागत, मानव शक्ति में गुणवत्ता का अभाव……..और बहुत कारण है) और छोटे उद्योग तो बेरोजगारों की फौज है जो जबरदस्ती अपने आपको किसी काम मे उलझाए हुए है । क्या यह सोचने योग्य नहीं है?
      यह विचार आलीशान एयरपोर्ट, होटल, कोनफ्रेंस और पुरस्कार समारोहों में भाग लेने से नहीं आएगा। आलीशान एयरपोर्ट, होटल, कोनफ्रेंस और पुरस्कार समारोहों में भाग लेने से ड़ोपामाइन, सेरोटोनिन और औक्सिटोसिन का स्राव हो जाएगा। इसी तरह तो आज खुशी को परिभाषित किया जाता है।

    “अगर आप पूरे जीवन भर की खुशी पाना चाहते हैं तो दूसरों की मदद कीजिये।”
    इस तरह ड़ोपामाइन, सेरोटोनिन और औक्सिटोसिन का स्राव बहुत बाद में होता है, पर दूसरों के काम आना ही सच्ची खुशी है।

    आपके गाँव/ कस्बों/जिलों में अर्थव्यवस्था पर ध्यान दीजिये जहां आज भी 75% लोग रहते हैं। लोग अस्पताल, स्कूल, मनोरंजन, खरीददारी हर काम के लिए मेट्रो सिटि या क्षेत्रीय महानगर जाना चाहते हैं। एक तो सेवाओं, कृषि और छोटे उद्योगों में वैसे ही कमाई कम है, ऊपर से साल भर की कमाई इन प्रयोजनों से मेट्रो सिटि या क्षेत्रीय महानगर में खर्च होती है। बड़ा खेद है की इस बारे में ना तो कोइ प्रशासनिक सुधार हो रहा है, ना ही कोई नया सिद्धान्त बन रहा है और ना ही विचार पैदा हो रहा है। सब जल्दी से जल्दी गाँव और कस्बे छोड़ छोड़ के भाग जाना चाहते हैं। देश की बहुतायत जनसंख्या गंभीर रूप से तकलीफ में है। मैं पूरी ज़िम्मेदारी के साथ यह कहना चाहता हूँ की सरकार का पूरा प्रयास है कि जनता को अपनी सच्ची तकलीफ़ों का एहसास ना हो और उन्हे फील गुड होता रहे – ड़ोपामाइन, सेरोटोनिन और औक्सिटोसिन स्रावित होता रहे। अकाउंटेंट मालिक को व्यवसाय कि वास्तविक स्थिति नहीं दिखा रहा है, फिल्में हिन्दू राजाओं का महिमा मंडन कर रही हैं, सोशल मीडिया सरकार कि तारीफ़ों से भरा है, सरकार लोगों को विकास कि निशानी पुल, बांध, सड़क, ऊंची इमारतें दिखा रहा है । विपक्ष अलग ही विषय चुन रहा है – जायें तो जायें कहाँ। लोगों के पास जीविकोपार्जन के साधन नहीं हैं, अर्थव्यवस्था आत्मनिर्भर नहीं है और हमारे उद्योग धंधे मात्र नाम मात्र का लाभ कमा रहे हैं।

    हमारी शिक्षा नीति हमारे लोगों पर और भी कयामत ढा रही है – साधारण जनता कर्ज़ लेकर, व्यवसाय से पूंजी निकाल कर, खेत और गहने बेच बेच कर बच्चों को पढ़ा रही है और हमारे पेशेवर संस्थान अभी तक पाठ्यक्रम बदलने से बाज़ नहीं आ रहे है। मैं नहीं कहना चाहता पर – कौनसा पाठ्यक्रम हो जो बच्चों को समाज के काम का उत्पाद (product) बना सके, ये भी अभी तक पेशेवर संस्थानो द्वारा तय नहीं हो पाया है। बच्चे किसी भी समाज में उपयोगी हों, पर क्या वो भारतीय समाज की समस्याएं सुलझा पाएंगे। खराब कार्यशील पूंजी प्रबंधन, पूंजी लागत प्रबंधन, मार्केटिंग प्रबंधन, कुशल पेशेवर लोगों की कमी, खराब टेक्नोलोजी से जूझते हमारे छोटे और मझोले उद्योग इन बच्चों का गंतव्य नहीं है – ये बच्चे इन उद्योगों के लिए उपयोगी भी नहीं है। नीति निर्माताओं को हमारी औध्योगिक आत्मनिर्भरता, शिक्षा की सामाजिक उपयोगिता, जनता के जीवन स्तर में सुधार और सभी सत्ताओं के (आर्थिक सत्ता और स्वायतता भी) विकेन्द्रीकरण के बारे में सोचना चाहिए। किन्तु वे तो 5% लोगों के बारे में सोच सोच कर, कैसे विकास का विज्ञापन करके सरकार की टी आर पी बढ़ाए इस बारे में सोचते हैं। विचारों और सिद्धांतों में मौलिकता अवश्यक है। लोगों की देखा देखी कपड़ों और खाने का फैशन करना ठीक है पर सिद्धांतों और विचारों का फैशन बहुत महँगा पड़ता है।

    मेरा बिलकुल यह मत नहीं है की मनोरंजन न हो आप मूढ़ बने रहे या विकास से अनभिज्ञ हो जायें, ड़ोपामाइन, सेरोटोनिन और औक्सिटोसिन का स्राव भी होना चाहिए। पर यथार्थ को जानिए, यथार्थ की अनदेखी करना अपने आप में एक नशा है। समाज यदि किसी तकलीफ से गुज़र रहा है तो एक दिन आप तक भी वो तकलीफ पहुँच सकती है। आप उसे समझें और सकारात्मक रूप से उस समस्या का निदान करें।

    दुनिया में हो रहे विकास की जानकारी रखिए, पर यह भी सोचिए की हमारे देश की क्या वास्तविकता है। नीतियां, निर्णय, शिक्षा और सीमित साधनों की दशा और दिशा अपने देश की वास्तविकता से निर्धारित होनी चाहिए। सच्चाई अगर कड़वी हो तो भी हमे उसका सामना करना होगा – ड़ोपामाइन, सेरोटोनिन और औक्सिटोसिन का इंजेकशन लगा कर हम शतुरमुर्ग की तरह रेत में सर नहीं छुपा सकते। धीरे धीरे ही सही वास्तविक सुधार होना चाहिए।

     लेखक एवं विचारक:- राहुल शर्मा,चार्टर्ड अकाउंटेंट

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