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    Home»All News»मंदिर के चंदे की चोरी आखिर कब तक?
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    मंदिर के चंदे की चोरी आखिर कब तक?

    पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़, ताते तो चाकी भली, पीस खाए संसार॥
    adminBy adminJuly 11, 2026No Comments6 Mins Read
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    1. आपको लगता है कि आप वर्तमान में राम मंदिर के चंदे में हुई हेराफेरी के बारे में मुझसे कुछ सुनेंगे, तो आप भ्रम में हैं। मैं फिर आपको याद दिलाना चाहूँगा कि मेरे द्वारा चयनित विषय राजनीति के महत्व के लग सकते हैं, किंतु उनका संदर्भ और परिप्रेक्ष्य बिलकुल अलग है। मुझे राजनीति से कोई दिलचस्पी नहीं है, और नरेंद्र भाई मोदी तथा राहुल गांधी को मैं उतना ही अपना मानता हूँ, जितना वे मुझे अपना मानते होंगे।

    खैर, आप इस घटना को समाज के चारित्रिक पतन से जोड़कर देख रहे होंगे, पर मुझे इस घटना का सामाजिक पतन के साथ ऐसा कोई सह-संबंध नहीं दिखाई देता। इसमें चरित्र का प्रश्न कहाँ है? मंदिर भी एक कार्यस्थल है (देवस्थान विभाग, राजस्थान के कई कर्मचारियों के लिए ही सही) और चंदा भी एक प्रकार से आय है (पंजीकृत धार्मिक संस्थाओं के लिए ही सही)। देवस्थान विभाग ने कई मंदिरों के भत्ते और कई पुजारियों की तनख्वाह बाँध रखी है। जिनका स्वयं का मंदिर है, वे बड़े अच्छे से जानते हैं कि मंदिर प्रबंधक और मंदिर मालिक के बीच प्राप्त होने वाले चंदे को लेकर अक्सर विवाद रहता ही है। सरकार और मंदिर मालिकों के बीच फसाद की जड़ चंदा ही है; कई मंदिरों में चंदे की पेटी सरकारी अधिकारियों के सम्मुख खोली जाती है। मुझे इस जीवन में कई “एक्सक्लूसिव” सौभाग्य प्राप्त हुए हैं; एक सौभाग्य यह भी है कि जयपुर में नाहरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित एक मंदिर का बहुत करीबी सानिध्य मुझे मिला। मैं वहाँ शांति की तलाश में अक्सर जाया करता था और मुझे उस मंदिर में परम श्रद्धा है। मेरा मानना है कि “भक्ति” में इतनी “शक्ति” है कि जड़ में भी चेतना भर देती है। पर मेरे लिए कबीर भी पूज्य हैं और मैं मंदिर में भी जाता हूँ। कबीर की वाणी है:

    पत्थर पूजे हरि मिले, तो मैं पूजूँ पहाड़,

    ताते तो चाकी भली, पीस खाए संसार॥

    मैं कतई कबीर दास जी के विरुद्ध बात नहीं कर रहा हूँ। कबीर दास जी का अपना मार्ग था, जो स्वयं को जानकर सत्य का साक्षात्कार करने का मार्ग है। “अहम् ब्रह्मास्मि”—मुझमें और हर शरीर में ईश्वर विद्यमान है—यह भी सत्य के साक्षात्कार का मार्ग है। सगुण भक्ति और समर्पण भी एक मार्ग है, जिसमें मीरा, तुलसीदास, सूरदास और चैतन्य महाप्रभु हुए हैं। यह आप पर है कि आपको किस मार्ग पर ईश्वर की अनुभूति होती है और आप किस मार्ग पर चलते हैं। अंततोगत्वा आप सत्य का साक्षात्कार करेंगे, यदि आपका मार्ग उचित है। भक्ति से मीरा के लिए कृष्ण और प्रह्लाद के लिए नरसिंह उत्पन्न होते ही रहेंगे। मैं विश्वास करता हूँ:

    कौन कहते हैं भगवान आते नहीं,

    तुम मीरा की तरह बुलाते नहीं।

    अब बड़ी स्वाभाविक जिज्ञासा है कि जब भगवान भक्ति करने से आते हैं, तो मंदिर के पुजारी को चंदे में हेराफेरी क्यों करनी पड़ती है। इस विषय में मैं बाद में बात करना चाहता हूँ। पहले मैं अपने पहाड़ी मंदिर जाने का विषय से संबंध बता दूँ। निरंतर मंदिर जाने से धीरे-धीरे मैं नाहरगढ़ की पहाड़ी पर स्थित उस मंदिर के प्रबंधक (प्रधान पुजारी) और मंदिर के मालिक के बहुत करीबी संपर्क में आ गया। वे भी मुझे अपना सदस्य मानने लग गए। मैं अक्सर वहाँ जाता था। आप जो भावना मन में रखते हैं, वही प्रकृति देर-सवेर आपके सामने परिलक्षित करती है। मेरी श्रद्धा के कारण मुझे हर बार वहाँ जाकर शांति अनुभूत होती थी:

    जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि

    वहाँ जो मंदिर प्रबंधक (पुजारी जी) थे, वे अपने पास स्टील का पीपा (बॉक्स) रखते थे। वह पीपा बड़ा रहस्य था। उस पीपे में क्या है, यह किसी को नहीं पता था। मुझे पुजारी जी ने बताया कि उनके पास बचत किए हुए 1.50 लाख रुपये हैं। यह बचत का पैसा पुजारी जी ने रोटी, नमक और चटनी खाकर, तनख्वाह बचाकर और आने-जाने वालों से मिलने वाले पैसे बचाकर इकट्ठा किया था। अक्सर पुजारी जी और मालिक के बीच चंदे को लेकर चर्चा होती। कुछ लोग पुजारी जी को अलग से (individual capacity में) दान दे दिया करते थे। पुजारी जी उस दान पर अपना अधिकार बताते थे और मंदिर मालिक अपना। मैं सोचता था कि जब घर छोड़ दिया, संसार छोड़ दिया, फिर पुजारी जी का यह कैसा चिपकाव है। एक दिन मुझे पता लगा कि पुजारी जी के दान के पैसे चोरी हो गए। अब पुजारी जी बहुत दुखी थे। उन्होंने पुलिस में एफआईआर भी करवाई। कुछ पता नहीं लगा। अब मैं सोचता हूँ तो लगता है कि पुजारी जी वैराग्य ही तो ईश्वर से माँग रहे थे। यह जमा पूँजी वैराग्य में बाधा बन रही थी; ईश्वर ने मुक्ति के मार्ग में आ रही उनकी बाधा को हर लिया। मेरी अल्प बुद्धि में आया:

    कर्म प्रधान विश्व रची राखा, जो जस करहि सो तस फल चाखा॥

    कर्म करे किस्मत बने, जीवन का यह मर्म,

    प्राणी तेरे हाथ में, तेरा अपना कर्म॥

    ईश्वर की बनाई हुई प्रकृति इस प्रकार की है कि व्यक्ति की मेहनत और किया हुआ प्रयास उसके धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष की प्राप्ति को सुनिश्चित करते हैं। धर्म की प्राप्ति के लिए निर्धारित कर्तव्य अलग हैं और अर्थ की प्राप्ति के लिए निर्धारित कर्तव्य अलग। यदि आप मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चल रहे हैं, तो जरूरी नहीं कि आप आर्थिक रूप से संपन्न भी हों। इसी प्रकार शारीरिक स्वास्थ्य के लिए किया हुआ व्यायाम आपको धर्म के क्षेत्र में उन्नति नहीं दे सकता। मेरा व्यक्तिगत अनुभव है कि ईश्वर की सेवा से व्यक्ति को भौतिक जगत में गहरी आत्मिक शांति, मानसिक स्पष्टता, भावनात्मक दृढ़ता और अपने अंतिम गंतव्य के प्रति जागरूकता प्राप्त होती है। इसका यह अर्थ बिलकुल नहीं है कि आपको आर्थिक समृद्धि भी स्वतः ही प्राप्त हो जाएगी। आर्थिक समृद्धि और परिवार-पालन के लिए आपको जीविकोपार्जन के प्रयास करने होंगे; यही प्रकृति का नैसर्गिक नियम है। आर्थिक समृद्धि के लिए “कर्मठ” होना प्राथमिक शर्त होती है।

    भक्ति मार्ग के अनुसरण से पैदा होने वाली संकल्प शक्ति और इच्छा शक्ति बहुत प्रबल होती है। जब आप भौतिक आहार का निग्रह करते हैं और व्रत रखते हैं, तो यह आपकी संकल्प शक्ति को दृढ़ करने का माध्यम होता है। आपकी संकल्प शक्ति धीरे-धीरे दृढ़ होती चली जाती है, और समय आने पर आप अनंत काल का संकल्प भी ले लेने में सक्षम होते हैं। भौतिक संसार के दृष्टिकोण से यह शक्ति अपने आप में बहुत बड़ी चारित्रिक विशेषता है।

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