पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी की हत्या का वह दिन
इक्कीस मई…
आज बरसों बाद फिर मेरी आँखें नम हुईं, वही बैचेनी महसूस हुई क्योंकि यह तारीख मेरे लिए सिर्फ एक दिन नहीं है। यह एक ऐसी याद है, जो हर साल दबे पाँव धीरे से मेरी आँखों के सामने चली आती है; थोड़ी भीगी हुई सी , दिल पर भारी बोझ सी और चेतन- अवचेतन में कहीं भीतर तक धंसी हुई।
मैं तब छबड़ा में थी,अपनी छोटी बहन दीपा # Deepmala Sharma के साथ। हम दोनों अपने चाचा के पास गर्मियों की छुट्टी बिताने गई थीं। मैं शायद बारहवीं में आई थी। उम्र वही थी, जब दिल बिना वजह जुड़ता है और बिना वजह टूट भी जाता है। उस दिन दोपहर बाद से ही मौसम कुछ बदला-बदला था। हवा में एक अजीब सी बेचैनी थी, जैसे कुछ होने वाला हो। धीरे-धीरे हवाओं ने आँधी का रौद्र रूप ले लिया और तेज बारिश शुरू हो गई । यह कोई आम बारिश नहीं थी। आसमान से बादल बरस नहीं रहे थे, ऐसा लग रहा था कि प्रकृति किसी बात पर गुस्सा है। फिर ऐसा तूफ़ान आया कि जैसे आसमान खुद किसी अनकहे दुःख में फट पड़ा हो। लाइटें गुल हो गईं, कई पेड़ गिर गए, कई जगह बिजलियाँ भी गिरी और सबसे आश्चर्यजनक बात तो यह थी कि यह मंजर केवल राजस्थान के कुछ हिस्सों में ही नहीं बल्कि देश के अधिकांश भागों में देखा गया। यह सब मुझे दूसरे दिन सुबह “राजस्थान पत्रिका” अख़बार पढ़कर पता चला। पर राजस्थान पत्रिका में उस दिन इस भयावह मंज़र की ख़बर के साथ एक और ख़बर छपी थी काली पट्टियों के साथ बोल्ड फ़ोंट में , कि राजीव गांधी नहीं रहे…!! फ्रंट पेज पर राजीव गांधी का ब्लैक एंड व्हाइट पोट्रेट भी था, तत्कालीन मुख्यमंत्री भैरोसिंह शेखावत की संवेदनाएं भी और सात दिन के राष्ट्रीय शोक की घोषणा भी। मेरी यादों में यह सब कुछ इस तरह धँस चुका है और रिसता रहा है जैसे कि किसी कँटीले जंगल में नंगे पैर चलते हुए कोई काँटा चुभ जाए और उसमें से देर तक ख़ून की बूँदे निकलती रहें।उस दौर में इंटरनेट, सोशल मीडिया और मीडिया चैनल्स तो थे नहीं जो तत्काल ख़बरे प्रसारित कर दें, बस रेडियो-दूरदर्शन और अख़बार ही थे जो सूचनाओं को प्रसारित करने में सक्षम थे।और रात में भारी बारिश के चलते बिजली बंद थी तो टीवी भी बंद था और रेडियो भी।
उस दिन अखबार में छपे एक वाक्य से मेरे भीतर कुछ टूट गया।मैं आज भी समझ नहीं पाती कि ऐसा क्यों हुआ था? क्या यह मेरे साथ ही हुआ था या देश के बच्चे से बड़े होने की दहलीज़ पर क़दम रखते सभी के साथ भी? मेरा राजनीति से कोई खास लगाव कभी नहीं रहा, न ही नेताओं के जाने से दिल यूँ कभी भर आता था। लेकिन उस दिन… मैं भीतर तक बिखर गई थी।
मैं रोई… बहुत रोई; दीपा भी ख़ूब रोई
अख़बार हाथ में लेकर और बोली कि इसलिए कल रात भर इतना आँधी-तूफ़ान आया था और अब देख जीजी सब कुछ शांत है।
वो मुझसे चार साल छोटी है लेकिन उस वक़्त उसकी संवेदनाएँ मेरे से किसी मायने में कम नहीं थीं। हम दोनों चुप थे, लेकिन आँसू अपनी ही जुबां में बह रहे थे। कोई औपचारिक शोक नहीं था, कोई सिखाया हुआ दुख नहीं था; बस एक सच्चा और बेहद निजी दर्द था जो मुझे और मेरी बहन को अपनी जद में ले रहा था।
शायद इसलिए कि हमारे लिए वे सिर्फ एक प्रधानमंत्री नहीं थे। उनके चेहरे में एक अलग ही सादगी थी। न कोई बनावट, न कोई आक्रामकता। एक हल्की-सी झिझक, जैसे वे इस कठोर राजनीति की दुनिया के लिए बने ही न हों। उनकी आँखों में एक पाकीज़गी थी , ऐसी पाकीज़गी जिसमें छल-कपट की कोई जगह नहीं थी। वे उन नेताओं जैसे नहीं थे जो शब्दों से भीड़ को उकसाते हैं और उनको अपने फायदे के लिए इस्तेमाल करते हैं । राजीव गांधी तो ऐसे राजनेता या यों कहे की राजनेता नहीं एक सरल और सहज व्यक्तित्व के इंसान थे जो अपनी सहजता और सच्चाई से अपने राजनीतिक दुश्मनों के दिल में भी धीरे- धीरे उतर जाते थे।
कभी-कभी लगता था, वे एक ऐसे इंसान हैं जिन्हें राजनीति में होना ही नहीं चाहिए था। एक पायलट की सादी-सी ज़िंदगी, एक सामान्य परिवार ; शायद वही उनका असली संसार था। लेकिन परिस्थितियों ने उन्हें वहाँ ला खड़ा किया, जहाँ हर कदम पर जिम्मेदारी थी और हर निर्णय पर सवाल।
जब इंदिरा गांधी की हत्या हुई, मैं छोटी थी और ज़्यादा जान नहीं पाई पर मम्मी उस समय आल इंडिया रेडियो पर उनके अंतिम यात्रा का आँखो देखा हाल सुन रही थी और रो रही थीं तो समझ आ रहा था कि कहीं कुछ तो ग़लत हुआ है। तब उन्होंने जिस तरह खुद को संभाला, उसमें एक बेटे का दुःख भी था और पूरे देश का भार भी। उस समय उनका चेहरा एक नेता से ज्यादा उस इंसान का चेहरा था, जिसने अभी-अभी अपना सबसे अज़ीज़ खोया हो। मैंने तब उनको नहीं पहचाना, लेकिन जैसे जैसे मुझ में समझदारी आई वैसे वैसे शायद उसी सच्चाई भरे चेहरे ने उन्हें मेरे जैसे अनजान लोगों से भी जोड़ दिया था।
उनके जाने के बाद मेरे भीतर एक अजीब-सा खालीपन घर कर गया। कई दिनों तक मन किसी काम में नहीं लगा। किताबें खुलती थीं, पर शब्द धुंधले नजर आते थे। बाहर सब कुछ हमेशा की तरह चलता रहा, लेकिन मेरे भीतर जैसे सब ठहर गया था।
आज सोचती हूँ, तो लगता है; वह सिर्फ एक शोक नहीं था, वह एक रिश्ता था… जो बिना किसी नाम के बना था, और बिना बताए टूट गया था।
समय बीत गया। ज़िंदगी ने बहुत कुछ दिखाया; कई चेहरे आए, कई गए। लेकिन वैसा जुड़ाव फिर कभी किसी से नहीं हुआ। क्योंकि कुछ लोग तर्क से नहीं, एहसास से जुड़ते हैं और ऐसे रिश्ते दोबारा नहीं बनते।
आज भी जब इक्कीस मई आती है, तो वह रात सजीव हो उठती है। वही तेज़ हवा, वही बारिश, वही बेचैनी… और वही स्तब्ध कर देने वाली खबर। कभी-कभी लगता है, उस दिन जो तूफ़ान आया था, वह सिर्फ मौसम का मिजाज नहीं था; जैसे आसमान भी किसी अपने के जाने पर रो पड़ा था।
मेरे जीवन में अगर किसी राजनेता ने सच में दिल में जगह बनाई, तो वह सिर्फ राजीव गांधी थे शायद पहले… और आख़िरी भी ।
मेरे हिसाब से राजनीति में मिसफ़िट वे शायद एक परफेक्ट राजनेता नहीं रहे हों,लेकिन एक सच्चे इंसान जरूर थे।
और यह बात मैं किसी राजनीतिक विचारधारा से प्रभावित होकर नहीं कह रही हूँ । यह उस टीन ऐजर लड़की की अपनी सच्चाई है,जो एक तूफ़ानी रात में बिना किसी स्वार्थ के…किसी के लिए रो पड़ी थी,
और आज भी, इतने सालों बाद,
उस नाम को याद करके खामोश हो जाती है…🙏😔
-मणिमाला शर्मा
वरिष्ठ पत्रकार और विश्लेषक

