आखिर युवा आंदोलन और विपक्ष की तीव्रता के चलते केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को देना पड़ा इस्तीफा।
देर आए- दुरुस्त आए
परीक्षा में नकल माफिया और सरकार की नाकामी पूरे देश में एक बड़ा सवाल बन गया था। नौजवानों को अपने वर्तमान और भविष्य की चिंता सताने लगी थी ऐसे में उनका आंदोलन हो जाना कोई आश्चर्य का विषय नहीं है।
सरकार का युवाओं पर दमन चक्र लाठी चार्ज सैकड़ो युवाओं का घायल हो जाना जनरल ड्रायर की याद दिला गया। अहिंसापूर्ण आंदोलन और विपक्ष की मजबूती लोकसभा राज्यसभा में लंबा गतिरोध, राहुल प्रियंका की भूमिका तथा उनका युवाओं के साथ संघर्ष सरकार को बैक फुट पर आने के लिए मजबूर होना ही पड़ा।
संघ प्रमुख मोहन भागवत एवं भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का यह कहना कि हमारी सरकार में इस्तीफा नहीं होते आंदोलन को और भी उग्र कर गया।
नेपाल के बाद बांग्लादेश युवाओं का आंदोलन भारत के लिए भी एक उदाहरण बन गया। जब-जब संविधान पर चोट होगी और तानाशाही अपने चरम पर पहुंचेगी आंदोलन तो होना निश्चित है।
कॉकरोच जनता पार्टी का उदय भी सीजेआई के एक बयान का परिणाम है। और तो और सत्ता दल के सांसद और बिगड़े बोल ने भी आग में घी का काम किया। चलो धर्मेंद्र प्रधान देर आए – दुरुस्त आए
– अशोक भटनागर राष्ट्रध्वज
स्वतंत्र पत्रकार एवं राजनीतिक विश्लेषक

