प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि तुष्टीकरण की सनक में शहजादे एक और खतरनाक चाल चल रहे हैं। बाबा साहेब अंबेडकर ने दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों को आरक्षण का अधिकार दिया था। कांग्रेस पार्टी दलितों, पिछड़ों, आदिवासियों का आरक्षण छीनकर उसे धर्म के नाम पर देना चाहती है। नरेंद्र मोदी ने कहा कि इंडी अघाड़ी एक ही एजेंडे से चुनाव लड़ रही है और वह है ‘मिशन कैंसिल’… इन्होंने कहा इंडी वाले जब सरकार में आएंगे तो धारा 370 को फिर से लागू करेंगे, सीएए को कैंसिल करेंगे। इतना ही नहीं, कांग्रेस और इंडी अघाड़ी वाले राम मंदिर को भी कैंसिल करना चाहते हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने बीड में जनसभा को संबोधित करते हुए कहा कि आज तीसरे चरण का मतदान खत्म होने को है और साथ ही इंडी अघाड़ी की उम्मीदें भी खत्म हो गई है। पहले चरण में इंडी अघाड़ी पस्त हुआ, दूसरे में ध्वस्त हुआ और आज तीसरे चरण में इंडी अघाड़ी का कहीं अगर छोटा-मोटा दीया जल रहा था तो वह भी बुझ गया। कांग्रेस अब खुलेआम तुष्टीकरण और वोट बैंक का खेल खेल रही है। इंडी एलायंस वोट जिहाद की अपील कर रहा है। 26/11 हमले के आतंकियों को क्लीन चिट दे रही है महाराष्ट्र कांग्रेस। जाहिर है, कांग्रेस का कसाब और पाकिस्तान के अन्य 10 आतंकवादियों से गहरा संबंध है। इंडी-अघाड़ी का एक ही एजेंडा है- ये सरकार में आएंगे तो मिशन कैंसिल चलाएंगे। इन्होंने कहा कि जब इंडी वाले सरकार में आएंगे तो वो धारा 370 को फिर लाएंगे। मोदी सीएए लाया है तो उसको कैंसिल करेंगे, तीन तलाक के कानून को कैंसिल करेंगे। मोदी जो गरीब को मुफ्त राशन दे रहा है उसको कैंसिल कर देंगे। इतना ही नहीं, इंडी-अघाड़ी वाले राम मंदिर को भी कैंसिल कर देंगे। मोदी, विकसित भारत के मिशन पर निकला हुआ है। इस संकल्प के लिए आज मैं आपसे कुछ मांगने के लिए आया हूं। मुझे आपका आशीर्वाद चाहिए। मेरी विरासत आप ही हैं। आपकी आने वाली पीढ़ियां वही मेरी विरासत है। मैं आपके भविष्य को बेहतर बनाने के लिए निकला हूं। आप सब ही मेरा परिवार हैं- मेरा भारत, मेरा परिवार। आज तीसरे फेज का मतदान खत्म होने को है और साथ ही इंडी-अघाड़ी की उम्मीदें भी खत्म हो गई हैं। पहले चरण में इंडी-अघाड़ी पस्त हुआ, दूसरे चरण में ध्वस्त हुआ और आज तीसरे चरण में इंडी-अघाड़ी का कहीं छोटा-मोटा दिया अगर जल रहा था, वो भी बुझ गया है।
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- भारत में शिक्षा प्रणाली में सुधार की जरूरत- मोहन भागवत (अपनी मांगों को लेकर प्रदर्शन कर रहे छात्र राष्ट्र विरोधी नहीं है। ) देश के अलग-अलग हिस्सों में पेपर लीक को लेकर जेन जी (नई पीढ़ी) के बढ़ते विरोध के बीच, राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि उनकी शिकायतें जायज़ हैं और भारत की शिक्षा प्रणाली में सुधार की ज़रूरत है। हाल ही में छात्रों के विरोध-प्रदर्शन और प्रदर्शनकारियों को ‘राष्ट्र-विरोधी’ कहे जाने पर आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि अगर जेन जी विरोध कर रहा है, तो वे राष्ट्र-विरोधी नहीं हैं। वे हमारे ही लोग हैं, हमारी अगली पीढ़ी हैं। मुझे नहीं लगता कि जेन जी ऐसी है। मुझे लगता है कि नई पीढ़ी – जेन जी और जेन अल्फा- हमारी मौजूदा पीढ़ी से ज़्यादा ईमानदार है, और देशभक्ति व सेवा की सच्ची अपील उन पर असर करती है। उन्होंने आगे कहा कि अब, जेन जीऔर जेन अल्फा सवाल पूछते हैं, उन्हें तार्किक जवाब और प्यार चाहिए,लोकतंत्र में यही तरीका है। इसे अंग्रेज़ी में ‘डिबेट’ कहते हैं, हम इसे ‘शास्त्रार्थ’ कहते हैं – वहाँ कोई बहस नहीं होती, बल्कि दो पक्ष होते हैं: ‘पूर्व’ और ‘उत्तर’। हम सभी पहलुओं को देखते हैं और हर किसी का अपना नज़रिया होता है, इसलिए हर विषय पर एक नया पहलू सामने आता है। तो, हमें कई राय और विरोधी राय मिलती हैं, जो मिलकर सच्चाई की पूरी तस्वीर बनाती हैं। ऐसा ज़रूर होना चाहिए। भागवत ने कहा कि मैं यह नहीं कहूँगा कि जेन जी को विरोध नहीं करना चाहिए, लेकिन लोकतंत्र में विरोध करने और काम करने के कुछ तरीके होते हैं। संविधान बनाने वालों ने, और डॉ. बाबासाहेब अंबेडकर के भाषणों में, इस बारे में संकेत दिए गए हैं। इस पर ध्यान दिया जाना चाहिए। हमें यह भी देखना चाहिए कि जेन जी विरोध करने के लिए आवाज़ नहीं उठा रही है, वे ऐसा इसलिए कर रहे हैं क्योंकि उन्हें कुछ दिक्कतें हैं और उन्हें ठीक किया जाना चाहिए। आंदोलन मेरे या आपके ख़िलाफ़ नहीं, बल्कि सिस्टम को सुधारने के लिए होना चाहिए। एक कार्यक्रम में बोलते हुए भागवत ने कहा कि उन्हें पुलिस और प्रदर्शनकारियों के बीच हालिया टकराव के सही हालात के बारे में जानकारी नहीं है, लेकिन युवाओं पर उनका भरोसा अटूट है। भागवत ने कहा कि मैं ‘जेन ज़ेड’ पर आँख बंद करके भरोसा करूँगा। उन्होंने आगे कहा कि उन्हें देश के युवाओं की नीयत और उनकी आकांक्षाओं पर पूरा भरोसा है। उन्होंने कहा कि शिक्षा कोई कमर्शियल बिज़नेस नहीं है। समुदाय की मदद से शिक्षा व्यवस्था को बेहतर बनाया जा सकता है। शिक्षा का आर्थिक बोझ बहुत ज़्यादा है। हमें सतर्क और सक्रिय रहने की ज़रूरत है और सिस्टम का नियमित रूप से आकलन करना होगा। हमें अपने शिक्षकों को भी प्रशिक्षित करने की आवश्यकता है। शिक्षा देना सिर्फ़ सरकार की ज़िम्मेदारी नहीं है, बल्कि यह एक सामाजिक ज़िम्मेदारी भी है – मोहन भागवत
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